मंगलवार, 12 अगस्त 2014

तुम नास्तिक कैसे बने?

"तुम जानते हो जब तुम किसी से बेइम्तेहा प्यार करते हो और उसके बेवफा होने के बाद फिर उतनी ही नफरत, तब तुम वास्तव में उससे उतनी नफरत नहीं कर पाते। प्यार दफनाया जा सकता हैं मारा नहीं जा सकता। तुम उस शख्स से नफरत करते हो लेकिन उससे जुडी बाते, यादे सब तुम्हे अच्छी लगती हैं। वह बीज जो दफनाया जाता हैं पौधा बन जाता हैं। जब वो शख्स तुम्हारे सामने आता तुम नजरे फेर लेते हो लेकिन उसके जाने के बाद उसे देखते रहते हो। प्यार शायद ऐसा ही होता हैं...." ."....लेकिन मैंने तुमसे पूछा था कि तुम नास्तिक कैसे बने?" -सुमीत मेनारिया

शनिवार, 9 अगस्त 2014

ईश्वर से जुड़े कुछ प्रश्न?

प्रश्न अच्छा है यकीन है ईश्वर मे तो प्रमाण दिजिऐ ? अब प्रश्न नम्बर दो ईश्वर नही हैँ उसका प्रमाण आप दिजिऐ ? प्रश्न 3 ईश्वर की आवश्यकता क्यू है ? प्रश्न 4 ईश्वर की आवश्यकता क्यू नहीँ हैँ ? प्रश्न 5 क्या ईश्वर बुरा है ? तो फिर इतने व्यक्ति क्यू बेवजह मरते हैँ । प्रश्न 5 क्या ईश्वर अच्छा है ? तो क्यू इतने लोग मौत के करीब जाकर लौट आते है । वैसे प्रश्नो की सख्याँ तो कभी खत्म होने वालि नहीँ और इन पर विचार करे आप और मेँ और इनका रहस्य जाने इसके लिऐ हम काबिल नही. तो बेवजह आप और हम नास्तिकता या आस्तिकता की फटी चादर ओढे अपने को विवादित विषयो का हिस्सा बनाने की जगह अगर आप और मैँ मतलब की अगर हम सब सिर्फ मात्र मानव बनकर जीवन जीये ओर सिर्फ मानव बनकर अपनी मानवता निभा दे उतना शायद काफी होगा. बाकी अगर आप दिवार से सर फोडने के इच्छुक है और इतना समय रखते है तो रास्ते खुले है ! फिर आप भी जानते है की रोज हजारो नास्तिक पैदा होते है और हजारो आस्तिक भी किसी मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च मे खडे बैठे या दंडवत पाये जाते है सघर्ष किजिऐ अगर परिणाम पता हो तो पर सागर को तैरकर पार कर पाना अंसभव और आप दोनो तो अलग अलग छोर पर खडे होकर अपने को सागर का मालिक घोषित करने पर तुले है । बाकी सब ठिक है । राहुल अब भी सुबह स्कूल जाता है राजु अब भी रोज सवेरे कचरे मे से पाँलीथिन खोजता है । तो चलने दिजिऐ दोनो का जीवन आपकी नास्तिकता या आस्तिकता इनके जीवन मे कोई उलटफेर करने वाली नहीँ

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

कैंडल मार्च

अबे चल न!
क्या करना हैं यार चलके? फ़ोकट में बोर होंगे और टाइम वेस्ट हैं कुछ
नहीं बदलना हैं.
तो हमें क्या बदलना हैं कल सन्डे हैं वैसे भी फ्री ही हैं, अखबार में फोटो भी आ
जाएगा.
कौनसा हमारा आएगा? आना तो लडकियों का ही हैं. टेंसुए टपकाता चहरा.
अखबार में नहीं आएगा तो फेसबुक पर डाल देंगे, कवर फोटो! और
छोरिया भी आएगी, टाइम पास हो जाएगा.
तू मूवी देखने के लिए बोल रहा था उसका क्या?
कौनसा रात रहना हैं, घंटे भर रुकेंगे और फिर वहां से मूवी चले जाएँगे.
ठीक हैं भाई डन.
अगले दिन पाल पर बलात्कार पीडिता के लिए कैंडल मार्च निकाला गया.
बड़ी मात्रा में युवा शामिल हुए.

-सुमित मेनारिया

सोमवार, 4 अगस्त 2014

चोर

"चोर" बस अपनी मंथर गति से आगे बढ़ रही थी. कुछ लोग ऊंघ रहे थे, कुछ आपस में बाते कर रहे थे, तो कुछ बस खिड़की से बाहर झाँक रहे थे. कंडक्टर गेट पर खड़ा सवारियों उतार और चढ़ा रहा था. बस एक स्टेशन पर रुकी और अचानक एक 10-12 साल की लड़की बस में भागते हुए चढ़ी और पीछे ही पीछे सीट पर जाकर दुबक गई. बिल्कूल जर्जर हालत में थी, फटे हुए कपडे, रूखे बाल, कई दिनों से धोया हुआ चेहरा, शायद कोई भीख मांगने वाली होगी. बस आगे बढ गई. सब अपने हाल में मगन हो गए. अगले स्टेशन पर बस रुकी. दो मुस्टंडे बस में चढ़े. "कहाँ गयी वो, इसी बस में तो चढ़ी थी?" "हाँ, हाँ, मैंने भी देखा था, यही बस थी" "कौन चाहिए?" कंडक्टर ने पूछा. "वो चोर साली, मेरे घर से चोरी कर के भागी हैं" "हाँ एक लड़की आई तो थी, शायद पीछे गयी होगी" तीनो ने पीछे नज़र गुमाई लेकिन कोई नज़र न आया. "ये यहाँ हैं, सीट के नीचे हैं" पीछे से एक आदमी चिल्लाया और वो दोनों बिजली की गति से पीछे पहुंचे. "निकल बाहर…" दोनों में से एक आदमी सीट के नीचे अन्धाधुन लाते मारने लगा. वो लड़की रोने चिल्लाने लगी लेकिन बाहर नहीं आई. तभी कंडक्टर आया और नीचे झुक कर बोला "देख छोरी! बाहर आ जा वरना बहुत मारेंगे" "नहीं मैं नहीं आउंगी" लड़की रोते हुए बोली. इस पर कंडक्टर ने उसका हाथ पकड़ा और बाहर खीच लिया. "मैं नहीं जाउंगी'' कहते हुए वो एक पढ़े लिखे आदमी के पीछे छिप गई. "लड़की सीधे तरीके से चली जा वरना पुलिस में दे देंगे" एक आदमी बोला. "पुलिस में दे दो… लेकिन मैं नहीं जाउंगी" "कैसे नहीं आएगी तू हमें जानती हैं की नहीं" मुस्तंड़ो में एक बोला और खींच कर बाहर ले गया. उनके बाहर जाते ही कंडक्टर ने राहत की सांस ली. चलो बला टली और बस वापस अपनी गति से बढ़ने लगी. ------ अगले दिन अखबार में खबर थी, "एक लड़की की लावारिश लाश सड़क किनारे मिली" फोटो छपी थी, हाँ वही थी. शायद बलात्कार भी हुआ था लेकिन गरीब की इज्जत इतनी ज्यादा नहीं हैं कि लुटने पर अखबार में छापी जाए. अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था. उस बस मैं पचास लोग थे, कुछ शिक्षित भी, पर एक की भी हिम्मत नहीं हुई जो पूछता की माजरा क्या हैं? अगर चोरी हुई थी चोरी का सामान कहाँ था, लड़की तो खाली हाथ थी. उसे सबके सामने लाते-घूंसे पड़ते रहे पर एक की हिम्मत न हुई की उस आदमी को रोक सके. सब तमाशबीन थे. शायद बस मैं उस एक लड़की को छोड़ कर बाकी सब "चोर" थे. -Sumit K. Menaria

रविवार, 3 अगस्त 2014

निरर्थक पढाई

आपने चाहे C.A., M.B.A. कुछ भी किया हो, आप
अपने आप को तब अनपढ़ महसूस करते हैं जब
आपका कोई पडोसी डॉक्टर की पर्ची लेकर
आता हैं और पूछता हैं
कि "बेटा जरा बताना कौनसी दवा लिखी हैं?"
भगवान कसम खुद पर धिक्कार महसूस होता हैं।

सानिया मिर्ज़ा- अतुल

लौंडे- लौंडिया, स्कर्ट- टांग,भागना -
भगाना ,फिल्म-खेल से जरा ऊपर उठना होगा,
दिमाग की सड़ांध बाहर फेंकनी होगी तब जाकर
बात समझ में आ सकेगी कि राष्ट्र राज्य और उसके
प्रतीक(symbols) क्या होते हैं..? हार्लिक्स-
व्हिस्पर का ब्रांड अम्बेसडर बनके घूमे कोई पूछ
रहा है क्या...जिस तरह
कल्पना चावला,सुनीता विलियम्स प्रतीक बनने के
योग्य नहीं ठीक उसी तरह
सानिया मिर्ज़ा भी नहीं..!

सानिया मिर्ज़ा- सुमित

'गद्दर' से लेकर 'एक था टाइगर' तक भारत-
पाकिस्तान की प्रेमकथाओ पर
जितनी भी फिल्मे बनी सब में हीरो भारतीय
और हीरोइन पाकिस्तानी ही हैं। यह मात्र कोई
संयोग नहीं हैं, फ़िल्मकार जानता हैं कि हम
भारतीय ये कभी बर्दाश्त नहीं कर सकते
कि एक दुश्मन देश
का लौंडा हमारी छोरी को लेकर भाग जाए।
लेकिन वास्तविक जीवन कोई फ़िल्मकार
नहीं चलाता, ऐसे में जब एक ऐसे खेल
का खिलाडी जिसके एक सामान्य मैच को हम
किसी युद्ध से कम नहीं मानते, हमारी एक
खिलाड़ी जो की खुबसूरत और कई
दिलो की धड़कन रह चुकी हो हो, को ब्याह के
ले जाए तो हम कैसे बर्दाश्त कर सकते? लेकिन
क्या कर सकते थे,जब मिया-
बीवी राजी तो क्या करेगा काज़ी? बस जल
भुन के रह गए, बत्तीसी भिड़ाते रहे।
लेकिन जब उस लड़की को हमारे देश के
किसी राज्य का ब्रांड एम्बेसेडर बनाया और
किसी 'राष्ट्रवादी' नेता ने उसके खिलाफ बयान
दिया तो हमारे अन्दर का जमा लावा बाहर आ
गया और हम शुरू हो गए।
हम विदेशी फोन इस्तेमाल करते हैं ,विदेशी कपडे
शान से पहनते हैं, कुछ दिनों पहले
प्रधानमंत्री द्वारा पाकिस्तान के
प्रधानमंत्री के स्वागत पर हमने जम कर
तालियाँ भिड़ी, क्रिकेट के एक मैच में
सेकड़ा लगाने पर हम करोडो दे देते हैं,
उत्तरप्रदेश के अमिताभ बचन गुजरात के ब्रांड
अम्बेसेडर हैं। वास्तव में बात विदेशी,
पाकिस्तानी, पैसा या दुसरे राज्य के होने
की नहीं हैं, बात हमारे गुरुर की हैं जिसे एक
पाकिस्तानी लौंडा तोड़ के चला गया।
सच्चाई कडवी हैं, और हमेशा होती हैं।