आँखे भले हम मीच ले, पर दिन तो न ढलता हैं। सुबह-अख़बार-चाय और कहना, सब ऐसे ही चलता हैं। यह चक्र हैं दुनिया गोल हैं सब वही पर आता हैं। जो करता वो भी भरता हैं, जो देखे वो भी चुकाता हैं। सूरज को दीपक दिखाते, और अंधियारी रात करते हैं। हम कद में छोटे सही, बड़े ख़यालात करते हैं। कोई हो शहंशाह घर का, हम डट कर मुलाकात करते हैं। छोटा मुंह हैं, मगर बड़ी बात करते हैं।
बुधवार, 30 अप्रैल 2014
हालात का तकाज़ा
विशेषणों की निम्नता
गुरुवार, 24 अप्रैल 2014
बाल विवाह कैसे रोके?
मात्र फेसबुक और ट्विटर पर चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो ये करे....
अगर आपके आसपास कही भी बाल विवाह होने वाला हो तो इसकी सुचना 1098 पर कॉल करके Child Care India को दे। आपके सम्बन्ध में सारी जानकारी गुप्त रखी जाएगी और यह संस्था पुलिस को सुचना देकर यह सुनिश्चित करेगी की बाल विवाह रुकवाया जाये। अधिक जानकारी http://childlineindia.org.in पर उपलब्ध हैं।
हो सकता हैं आपका एक छोटा सा प्रयास दो मासूम जिंदगियों को तबाह होने से बचा ले।
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रविवार, 13 अप्रैल 2014
एक मुलाकात
मुझे यहाँ की यही बात सबसे अच्छी लगती हैं, यह हरियाली, यह खुली हवा, यह फूलो की खुशबू. पहले तो मैं यहाँ रोज़ आता था लेकिन फिर…
सामने उसकी बड़ी सी फोटो लग चुकी थी, पहले तो लगा की किसी ने सम्मान में भेंट की होगी लेकिन फिर जब नीचे बड़े बड़े अक्षरों में फर्म का नाम लिखा देखा तो समझ में आया की यह तो एडवरटाइजिंग का एक तरीका मात्र हैं. सीढ़ियो पर पसरी धुल और पत्तियां देख कर एक बार तो हंसी आ गयी.
अन्दर गया तो वो वहीं सामने ही बैठा था मैंने बिना नज़रे झुकाए नमस्कार किया और दरवाजे पर ही बैठ गया.
"क्या बात हैं बड़े दिनों बाद आये हो?" उसने मुस्कुराते हुए पूछा.
"बस ऐसे ही पास से गुज़र रहा था तो मैंने सोचा कि मिलते चलु."
"कोई शिकायत तो नहीं हैं?"
मैं बस मुस्कुरा दिया.
"कुछ चाहिए तुमको?" उसने हँसते हँसते पूछा.
"जो माँगा था वो तो दे दिया तुमने?"
"तुम जानते हो कुछ चीजे किसी के भाग्य में नहीं होती..."
"भाग्य जैसा शब्द कम से कम तुम्हारे मुंह से तो अच्छा नहीं लगता."
"हाँ…तुम चाहो तो ज़िन्दगी भर मुझे इसके लिए कोस सकते हो."
"बाहर कचरा बहुत पड़ा हैं?" मैंने विषय बदलते हुए कहा.
"वे मंगलवार को आयेंगे."
"…और ये इतना बड़ा ताला क्यों लगा रखा हैं?"
"पिछले हफ्ते यहाँ पर चोरी हुई थी…"
"हा हा… तुम्हारे यहाँ पर चोरी!!" मैं ठहाका मार कर हंस पड़ा.
"तो उन्होंने तुम्हे भी नहीं छोड़ा….और तुमने यहाँ भी कुछ नहीं किया "
वो मेरे 'यहाँ भी' का मतलब अच्छी तरह से जानता था.
"मेरा क्या था… उन्होंने दिया था वो ही ले गए"
मैंने हँसते हँसते ही मोबाइल देखा.
मैंने वक़्त नहीं देखा था पर ऐसे मौके पर जब हम निकलना चाहते हैं तो ऐसे ही करते हैं.
"ठीक हैं मैं चलता हूँ" मैं कह कर उठ गया.
"हाँ हाँ आते रहना कभी कभी…तुम जैसे लोग बहुत ही कम आते हैं…"
"....लेकिन नास्तिक मंदिर में ना ही आये तो अच्छा हैं।"
शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014
मोदी का पत्नी धर्म!
मोदी द्वारा उम्मीदवारी के हलफनामें में अपनी पत्नी का नाम भरने के बाद जैसे मिडिया जगत में भूचाल आ गया है. मोदी विरोधी पतीला भर भर कर गालियाँ दे रहे हैं जैसे किसी भयानक अजगर की दुम उनके हाथ में आ गयी हो. तो वही मोदी समर्थक साम-दाम-दंड-भेद से मोदी की रक्षा करने में जुट गए है और इस हेतु वो कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं.
मोदी विरोधी चिल्ला चिल्ला कर बोल रहे हैं जो व्यक्ति अपनी पत्नी तक का सम्मान न कर पाया हो वो देश की बाकी औरतो का क्या सम्मान करेगा? जैसे हम जानते ही नहीं हो की डीएनए टेस्ट के बाद पिता बनने वाले लोग भी इस देश में हैं, अपनी पत्नी की हत्या के आरोपी और पाकिस्तानी एजेंट से सम्बन्ध रखने वाले भी उनकी पसंदीदा पार्टी से चुनाव लड़ रहे है… और जब कुछ समय पहले मोदी की पत्नी स्वयं कह चुकी हैं कि मोदी ने उनका काफी ख्याल रखा और उन्हें पढने और अपना भविष्य सवारने की पूरी आज़ादी दी तो आप कौन होते हैं उन्हें महिला सम्मान का सर्टिफिकेट देने वाले? प्रश्न उठ रहा हैं मोदी ने उन्हें तलाक क्यूँ नहीं दिया? क्या तलाक लेने का अधिकार या कर्त्तव्य केवल पुरुषो का हैं? क्या मोदी की पत्नी चाहती तो स्वयं तलाक नहीं ले सकती थी ? अब उन्होंने तलाक क्यूँ नहीं लिया यह तो उनका निहायती निजी मामला हैं. इस आरोप प्रत्यारोप की जद्दोजहद में दो दिन पहले ही मोदी के भाई द्वारा दिया गया बयान भी पूरी तरह नकार दिया गया.
लेकिन मोदी के पक्ष में जो तर्क दिए जा रहे हैं वो भी ज्यादा काबिले तारीफ़ नहीं है. तर्कों के खोखलेपन की हद तो तब हो गयी जब भगवान राम और बुद्ध को भी इसमें घसीटा जाने लगा हैं कि उन्होंने भी तो अपनी पत्नी को छोड़ा था.
माफ़ कीजिये मोदी कोई अवतार नहीं हैं, और न ही उतने महान… लेकिन क्या कारण हैं कि इतने वक्त बाद और वो भी चुनाव से एन पहले उन्हें अपनी पत्नी का नाम जाहिर करना पड़ गया और क्या फर्क पड़ जाता अगर वे अविवाहित लिख देते?
एक गजब की हिम्मत चाहिए सच बताने के लिए और उतनी ही हिम्मत सच को सुनने के लिए… मोदी सच बोल चुके हैं लेकिन मुझे सच सुनने की हिम्मत कहीं नहीं दिख रही हैं.
सोमवार, 7 अप्रैल 2014
भेड़चाल
भेड़ो का झुण्ड चला जा रहा था. आगे सरदार और पीछे उसके पैरो को देखकर चलते चैले. यकायक सरदार रुक गया. पीछे मुड़ा और सभा वाली फोम में आकर चिल्लाया.
मेरे प्यारे भाइयो और बहनों…
जैसा की आप सब नहीं देख सकते हैं
पर आगे एक तरफ कुआ हैं और दूसरी तरफ खाई हैं…
बड़ी विकट परिस्थिति हमारे सफ़र में आई हैं…
अगर खाई में गिरे तो भी मरते हैं
और कुए में गिरकर भी डूबते हैं…
तो हम बुखार में तपते सरदार…
आप सभी के सुख दुःख के हकदार
यह निर्णय करते हैं की हम खाई में गिरेंगे
थोडा उड़ेंगे थोडा एन्जॉय करेंगे
और अपने हक़ की मौत मरेंगे…
सब से आगे खड़ा चेला उवाचा-
बट सरदार हम खाई में क्यों गिरेंगे
कुए को एक बार एटेम्पट क्यूँ न करेंगे
पिछली बार गिरे थे न मरे थे न उड़े थे
पुरे दस साल बाद बाहर निकले थे
आप बार बार खाई में ही क्यूँ गिरते हो
आप कुए से इतना क्यूँ डरते हो?
सरदार गरजा… चैले पर बरसा…
तुम मुर्ख हो अज्ञानी हो नासमझ हो,
चुनाव के वक्त डरे हुए असमंझस में हो,
कुआ बहुत ही गहरा हैं,
पानी बहुत ही ठहरा हैं,
अन्दर गज़ब का कहर हैं,
कुए के अन्दर लहर हैं,
तुम लहर में डूब जाओगे,
भेड धर्म भूल जाओगे,
तुम्हे कुछ समझ नहीं आता हैं,
सरदार सब सही बताता हैं.
सब भेड़ो ने हाँ मैं सर हिला दिया. लेकिन अगर वे हिम्मत कर सर उठाये तो उन्हें दिख जाएगा कि सरदार की आँखों पर धर्म की काली पट्टी बंधी हैं, वो सबसे आगे होकर भी कुछ नहीं देख पा रहा हैं. और यह भी दिख जाएगा कि आगे न तो कुआँ हैं न खाई हैं… न लहर हैं न कहर हैं… बस एक संकरा रास्ता हैं जिसे वे पार कर सकते हैं अगर वे एक एक कर आगे बढे. अगर वे सरदार के पैर देख कर न चले.
रविवार, 6 अप्रैल 2014
"लिखने से क्या होता हैं?"
दोस्त के यहाँ पर नोट्स लेने के लिए गया था. दोस्त अन्दर नोट्स लेने के लिए गया, मैं बाहर खड़ा खड़ा इंतजार कर रहा था, तभी उसके पिताजी हाथ में अख़बार लिए आये. मुझे घूरते हुए देखने लगे. मैंने मुस्कुराकर अभिवादन किया.
"तुम हिमांशु हो न?" उन्होने पूछा.
"हाँ…" मैंने जवाब दिया.
"वो छोटा मुंह वाला पेज तुम ही चलाते हो?"
"जी अंकल" मैंने आश्चर्य, डर और ख़ुशी से मिलाजुला जवाब दिया.
"अच्छा लिखते हो…मगर लिखने से क्या होता हैं?"
"मतलब?"
"केवल लिखने से कुछ नहीं होता बेटा! जब तक हम खुद कुछ न करे."
मुझे अधिकतर लोगो से इसी कमेंट की अपेक्षा होती हैं.
"लेकिन कुछ न करने से तो अच्छा हैं न की हम कुछ तो अच्छा करे, शायद हम कुछ लोगो की सोच ही बदल दे" मैंने जवाब दिया.
"नहीं लोग नहीं बदलते हैं, वे केवल अनुकरण करते हैं, सोच का, इन्सान का, अवतार का, भगवान् का… अगर तुम कुछ करते हो वो भी करेंगे. केवल तुम कहोगे वो नहीं सुनेंगे."
"अंकल श्रम के विभाजन के सिद्धांत के बारे में तो सुना होगा?"
"हाँ…"
"यानी समाज में हर व्यक्ति कुछ काम अच्छे से कर सकता हैं, और उसे वही करना चाहिए…हम भी वही कर रहे हैं" मैंने अपना सारा फसबुकियाँ ज्ञान उढ़ेल दिया.
"लेकिन ऐसे तो सब वही करेंगे जो उन्हें पसंद हैं या यूँ कहे वो जो कि आसान हैं..." तभी मेरा दोस्त अन्दर से नोट्स लेकर आ गया.
"ठीक हैं अंकल, चलता हूँ…" मैं बच कर बाहर निकल गया.
"तेरे पापा तो बहुत कड़वा बोलते हैं यार" मैंने अपने दोस्त से कहा.
"बोलते ही नहीं लिखते भी हैं." उसने हंस कर कहा.
"मतलब?"
"अखबार में संपादक रह चुके हैं..." उसने जवाब दिया.
मैंने उधर देखा, अंकल सिर हिलाते हुए अख़बार पढ़ रहे हैं.
#himanshu #meet"
दान
कल्पना कीजिये आपके पिताजी हर महीने आपको पॉकेट मनी के 10 लाख रूपये देते हैं जिनका की आपको कोई हिसाब नहीं रखना हैं आप अपनी मर्जी से उन्हें खर्च करना हैं. शायद पिताजी इस भरोसे हैं की माँ खर्चो का ध्यान रखेगी लेकिन माँ भी केवल यह लिख देती हैं आपको कितने पैसे मिले हैं. तब आप इन पैसो का क्या करेंगे? वही जवाब दे जो सबसे पहले आपके मन में आया.
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भारत में मंदिरों का इतिहास बहुत पुराना हैं, इश्वर से भी पुराना और शायद भारत की सभ्यता को विश्व भर में प्रसिद्ध बनाने में मंदिरों का अतुलनीय योगदान हैं. मंदिर क्यूँ बनाये गए थे यह एक बहस का विषय हैं क्यूंकि इसका सरल जवाब यह होता हैं कि इश्वर के सामीप्य के लिए लेकिन अगर इतिहास पर नजर डाले तो यह किसी सभ्यता एवं उसकी कला को संजोने के माध्यम हैं. वैसे मंदिर का शाब्दिक अर्थ 'मन के अन्दर' होता हैं.
आज के युग में मंदिरों की पहचान उनकी भव्यता और उनको मिलने वाले चंदे से होती हैं. इन दोनों के बिच सामानांतर सम्बन्ध होता हैं लेकिन ये दोनों मिलकर एक मंदिर को महत्वपूर्ण बना देते हैं. आइये एक नज़र डालते हैं भारत के कुछ भव्य मंदिरों और उनके चंदे के ऊपर-
तिरुपति बालाजी
भारत के धनी मंदिरों की लिस्ट में तिरुपति बालाजी शीर्ष पर हैं... भगवान का खजाना पूराने जमाने के राजा-महराजाओं को भी मात देने वाला है... तिरुपति के खजाने में आठ टन ज्वेलरी है... 650 करोड़ रुपए की वार्षिक आय के साथ तिरूपति बालाजी भारत में सबसे
अमीर देवता है... अलग-अलग बैंकों में मंदिर का 3000 किलो सोना जमा और मंदिर के पास 1000 करोड़ रुपए फिक्स्ड डिपॉजिट हैं... 300 ईसवी के आसपास बने भगवान विष्णु के वेंकटेश्वर अवतार के इस मंदिर में रोज करीब 50 हजार से एक लाख लोग आते हैं... साल के
कुछ खास दिनों विशेषकर नवरात्र के दिनों में तो यहां 20 लाख तक लोग हर दिन दर्शन
करने पहुंचते हैं... बड़ी संख्या में यहां सिर्फ श्रद्धालु ही नहीं आते,
बल्कि उनका चढ़ावा भी बहुत भारी-भरकम होता है... नवरात्र के दिनों में ही 12 से 15
करोड़ रुपए नकद और कई मन सोना चढ़ जाता है... बालाजी के मंदिर में इस समय लगभग
50,000 करोड़ रुपए की संपत्ति मौजूद है, जो भारत के कुल बजट का 50वां हिस्सा है...
तिरुपति के बालाजी दुनिया के सबसे धनी देवता हैं, जिनकी सालाना कमाई 600 करोड़ रुपए से
ज्यादा है.... यहां चढ़ावे को इकट्ठा करने और बोरियों में भरने के लिए
बाकायदा कर्मचारियों की फौज है... पैसों की गिनती के लिए एक दर्जन से ज्यादा लोग मौजूद
हैं और लगातार उनकी शिकायत बनी हुई है कि उन पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है...
किसी-किसी दिन तो ऐसा भी होता है कि तीन से चार करोड़ रुपए तक का चढ़ावा चढ़ जाए
और रुपये-पैसे गिनने वाले कर्मचारी काम के भारी बोझ से दब जाएं.... ये तो तब है, जब
बालाजी के मंदिर में आमतौर पर लोग छोटे नोट नहीं चढ़ाते... यहां सोना, चांदी, हीरे, जवाहरात
और प्लेटिनम की ज्वेलरी तो चढ़ती ही है, सुविधा के लिए भक्त इनका बांड {bond}
भी खरीदकर चढ़ा सकते हैं... बालाजी के मंदिर में हर साल 350 किलोग्राम से
ज्यादा सोना और 500 किलोग्राम से ज्यादा चांदी चढ़ती है... ये स्थिति तब थी जब अंग्रेज
भारत आए थे… वे बालाजी मंदिर की शानो-शौकत और चढ़ावा देखकर दंग रह गए थे... कहते
हैं ईस्ट इंडिया कंपनी बड़े पैमाने पर बालाजी मंदिर से सोना - चांदी खरीदती थी... वर्ष
2008-09 का बालाजी मंदिर का बजट 1925 करोड़ था... इस मंदिर की देखरेख करने वाले
तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने 1000 करोड़ रुपए की फिक्स डिपोजिट कर रखी है...
कुछ महीनों पहले कर्नाटक के पर्यटन मंत्री जनार्दन रेड्डी ने हीरा जडि़त 16 किलो सोने
का मुकुट भगवान बालाजी को चढ़ाया था... जिसकी घोषित कीमत 45 करोड़ रुपए थी...
दरअसल, येदयुरप्पा सरकार की नाक में दम करने वाले बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं ने खनन
कारोबार में 4,000 करोड़ रुपए का मुनाफा कमाया था... उसी मुनाफे का 1 प्रतिशत इन्होंने
भगवान बालाजी को बतौर कमीशन अदा किया था, लेकिन आप यह न सोचें कि भगवान
वेंकटेश्वर या बालाजी को पहली बार इतना महंगा मुकुट किसी भक्त ने भेंट किया होगा...
वास्तव में बालाजी के मुकुटों के भंडार में यह 8वें नंबर पर ही आता है... इस तरह के उनके
पास पहले से ही करीब 15 मुकुट हैं... भारत के सबसे अमीर मंदिर तिरुपति के संरक्षकों ने
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के पास करोड़ों रुपए का सोना जमा किया है... इनसे मंदिर
को आर्थिक आय होगी.. तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् ट्रस्ट के चेयरमैन जे सत्यनारायण ने
1,175 किलो सोना स्टेट बैंक ऑफ इंडिया को सौपा पास भारत में सबसे ज्यादा सोना है और
उसने इसे तिजोरियों में रखने की बजाय बैंकों में रखना शुरू किया है... इससे उसे ब्याज
मिलता है... सन् 2011 में भी उसने 1,075 किलो सोना स्टेट बैंक ऑफ इडिया में
रखा था ... ट्रस्ट चाहता है कि सभी बैंक उसका सोना रखें..पुट्टापर्थी में सत्य साईं के
यजुमंदिर के ग्यारह प्राइवेट कमरों से 77 लाख रुपए कीमत के सोने चांदी और हीरे जवाहरात
मिले… इससे पहले भी सत्य साईं के कमरे से करीब चालीस करोड़ रुपए
की संपत्ति मिली थी… शिरडी स्थित साईं बाबा का मंदिर देश के सबसे अमीर मंदिरों में से एक
है... सरकारी जानकारी के मुताबिक इस प्रसिद्ध मंदिर के पास 32 करोड़ रुपए के अभूषण हैं
और ट्रस्ट ने 450 करोड़ रुपए का निवेश कर रखा है...धनी मंदिरों की फेहरिस्त में इन
दिनों चरम लोकप्रियता की तरफ बढ़ रहे शिरडी का साई बाबा मंदिर भी शामिल है,
जिसकी दैनिक आय 60 लाख रुपए से ऊपर है और सालाना आय 210 करोड़ रुपए
की सीमा पार कर चुकी है... शिरडी साई बाबा सनातन ट्रस्ट द्धारा संचालित यह मंदिर
महाराष्ट्र का सबसे धनी मंदिर है, जिसकी कमाई लगातार बढ़ रही है.... मंदिर के प्रबंधकों के
मुताबिक 2009 के मुकाबले अब तक 68 करोड़ रुपए से
ज्यादा की सालाना बढ़ोतरी हो चुकी है... यहां भी बड़ी तेजी से चढ़ावे में सोने और हीरे के
मुकुटों का चलन बढ़ रहा है... चांदी के आभूषणों की तो बात ही कौन करे...
सिद्धिविनायक मंदिर
मुंबई में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर, महाराष्ट्र राज्य में दूसरा और देश में तीसरे नंबर
का सबसे अमीर मंदिर हैं.
लेकिन इतनी बड़ी राशि का कहाँ और कैसे प्रयोग करना हैं इस बारे में कोई भी guideline नहीं हैं यानि की कोई भी मंदिर या ट्रस्ट को नहीं पूछने वाला की यह पैसा कहाँ जाएगा और उस पर भी रोचक यह की सरकार इस राशी पर कोई टैक्स नहीं लेती हैं. क्योंकि मंदिरों को मिलने वाला समस्त चन्दा आयकर अधिनियम की धाराओ में करमुक्त हैं. उल्टा मंदिरों को धार्मिक संस्थाओ के नाम पर अलग रियायते मिलती हैं .
महत्वपूर्ण यह हैं कि हम दान देते क्यों हैं?
-क्योंकि हम इश्वर को धन्यवाद कहना चाहते हैं?
माफ़ कीजियेगा लेकिन आपका उद्देश्य जरा सा भी पूरा नहीं हुआ. यह दान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में इश्वर के पास नहीं पहुचता बशर्ते आप मंदिर के ट्रस्ट या उसके पंडितो को इश्वर ना मानते हो.
-लेकिन हमें क्या मतलब हम तो अपनी तरफ से इश्वर को ही दान देकर आये हैं ना?
शुरू का उदहारण याद कीजिये. आप वो बेटा नहीं उस बेटे के पिता हैं जिसे लाखो रु. पॉकेट मनी मिलता हैं बिना किसी सवालात के और आप अब तक ये तो समझ ही चुके हैं कि अगर आप वो बेटा होते तो वो पैसा कैसे खर्च करते.
#himanshu #Meet"
माँ
अभी कल ही की तो बात लगती है, जब
बेटा स्कूल जाता था और माँ रोज सुबह उसे
स्कूल छोडने जाती थी और शाम को वापस लेने
जाती... रास्ते मे बेटा कुल्फी खाने
कि जिद करता तो माँ थोडी देर ना करके उसे उसकि मनपंसद कुल्फी जरूर दिलवाती.
कभी बेटा बीमार पडा तो रात रात भर
जागकर सर पर हाथ रखकर देखती कि बुखार
कम हुआ कि नही.... दिनभर चाहे घर का काम करके कीतना भी थक
जाये पर रात को बेटे को कहानी सुनाकर
जरुर सुलाती.... चाहे खुद कभी गरम
खाना ना खाया हो पर बेटे को गरम
खाना खिलाने के बाद
ही खाना खाती.... चाहे जैसा हो, बेटे के कान के
पिछे काजल का काला टीका जरूर
लगाती की कही नजर ना लग जाये....सब्जीवाले से मोलभाव करके 2-4 रू. बचाती और उन रुपयो कि टाफी
लाती क्योकि उसे पता होता कि बेटा घर पर उन
टाफियो के इंतजार मे बैठा होगा .
हर दिन मंदिर मे बेटे कि लंबी उम्र के लिये
प्रार्थना करती.... दिपावली पर अपने
पिताजी को कहती कि मेरी साडी तो अभी नई
है आप एक काम किजिये अपने बेटे के लिये
पटाखे और मिठाई ले लेना... पूरा साल
रबर के चप्पल पहनकर भी अपने लाडले को स्कूल के अलग और घर के लिये अलग से जूते दिलवाती....
अभी कल ही कि तो बात लगती है पर आज तो उसका बेटा जवान हो गया हैं... उसे अपनी अनपढ़ माँ से
शर्म आती है....आज
माँ को साथ रखना अपमानजनक लगता है....
बीवी को uncomfortable फिल होता हैं... ....आज उसके पास टाईम नही कि बीमार माँ के
पास जाकर उसकी तबीयत पूछ ले...ऑफिस से फुर्सत नहीं मिलती...अब तो विदेश
चला गया हैं पत्नी बच्चो का विजा तो बन
गया हैं पर
माँ का नही बन पाता... कहा था मैं 2
साल के अंदर आकर आपको ले जाउगा.... माँ हर रोज
उसके फोन का इंतजार करती है पर नहीं कर सकता कॉल रेट महँगी हैं....
अभी कल ही कि तो बात है एक चीता जल
रही थी और लोग बातें कर रहै थे "कैसा बेटा है माँ कि चीता को आग देने भी नही आया?"
-हिमांशु वोरा
भगत सिंह
आज सुबह 9.30 बजे उठा तो देखा एक हमउम्र नौजवान मेरे पास बैठा हुआ हैं। शक्ल कुछ जानी पहचानी लग रही थी।
"कौन हो भाई?" मैंने आँखे मलते हुए पूछा
"मैं भगत सिंह" उसने कहा।
"कौन भगत सिंह?"
भगत शुक्ला को तो मैं जानता था, मेरे साथ कॉलेज में पड़ता था।
"शहीद भगत सिंह।"
"ओह माय गॉड! ग्रेट भगत सिंह।"
"हाँ।" उसने कहा।
"पर मेरे पास क्या करने आये हो?"
"तुम्हे जगाने आया हूँ मित्र।"
जो सुबह चार-चार अलार्म से नहीं उठता, उसे ये क्या जगाएगा?
"क्या मतलब?" मैंने समझने की कोशिश की।
"तुम बहुत देर तक सोते हो!"
"हाँ वो कल रात को पढाई कर रहा था।"
मैंने साफ झूठ बोल दिया। वास्तव में 2 बजे तक गर्लफ्रेंड से चैटिंग कर रहा था।
"पर भाई मेरे पास क्यों आये हो?" मैंने खीजते हुए पूछा।
"तुम देश के युवा हो, मित्र! क्या तुम्हे देश की स्थिति का अनुमान नहीं हैं? ऐसे में अगर युवा ही आगे नहीं आयेंगे तो देश का क्या होगा?"
"क्या हुआ है देश को, अच्छी खासी तरक्की तो कर रहा हैं।"
"तो क्या तुम्हे गरीबी, भ्रष्टाचार, घौटाले, आतंक सब नहीं दीखते?"
"हां, लेकिन इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? सरकार कर तो रही हैं।"
"अगर हम भी ऐसा ही सोच लेते तो तुम सब आज आज़ाद न होते।"
"तुम्हारे वक़्त की बात अलग थी, तुम्हे ये तो मालूम था की तुम्हारे दुश्मन कौन थे? आज कल तो हर आदमी भ्रष्ट हैं?"
"अगर तुम्हें मालूम हो तब क्या उसे रोकोगे?" उसने कटाक्ष भरे स्वर में कहा।
"तो तुम क्या चाहते हो हम सब भी तुम्हारी तरह फांसी पर चढ़ जाये? भाई मेरे को तो एक बात समझ में नहीं आती। जब तुम अस्सेम्ब्ली में बम फ़ेंक चुके थे तो वहा खड़े क्यों रहे ? भाग क्यों नहीं गए?"
"अगर हमें परिस्थितियों से भागना ही होता तो हम वहाँ जाते ही क्यों?"
मुझे 'परिस्थिति' शब्द खुद पर व्यंग लगा। मैं कोई जवाब देता उससे पहले ही मेरा मोबाइल बजा। गर्लफ्रेंड का मेसेज था।
'गुड मोर्निंग जानू।'
मैंने भी वही का वही रिप्लाई में भेज दिया।
'आज मूवी देखने चलोगे।'
'ओके जान।'
"चलो एक बात तो अच्छी हुई। तुम्हारे शहीद दिवस के चक्कर में आज हमारे कॉलेज में छुट्टी हैं।"
"तो आज क्या करने वाले हो?" उसने बिलकुल मंद स्वर में कहा।
"कुछ नहीं मूवी देखेंगे और थोडा घूमेंगे फिरेंगे...."
मैने वक़्त देखा तो दस बज रही थी और 11 बजे से शो शुरू होने वाला था।
"ठीक है भाई अब तुम किसी और युवा को जगाओ, मैं लेट हो रहा हूँ। मुझे फ्री करो।" मैंने बिस्तर से उतरते हुए कहा।
वही तो कर के गया था।
उसने कहा और उठ कर चला गया।
पेज प्रचार
मेरे प्यारे भाइयो और उनकी बहनों,
(हम पहले ही बहुत बना चुके है।)
आप सभी को सादर अभिनन्दन, वंदन और स्पंदन। उम्मीद हैं आप सभी पेज का आनंद उठा रहे होंगे। जैसा की आप सभी को विदित हैं यह पार्टी(पेज) हमारा नहीं आप सभी का हैं। यह पेज आपका, आप के द्वारा और आपके लिए ही हैं। हम क्या हैं? मात्र चौकीदार!
मित्रोज यह पार्टी(पेज) एक संगठन हैं और संगठन के लोग ही इसकी ताकत होते हैं। कुछेक बुढाऊ के मुंह फुलाय लेने से संघठन ख़तम नहीं होता। यह चलता रहा हैं और चलता रहेगा।
पर फ्रेंड्स हम अकेले कुछ नहीं कर सकते, हमे भारी प्रचार की आवश्यकता हैं। हम दुसरी पार्टी(पेज) से गठबंधन कर ले पर हमारा वाजपेयीवादी ज़मीर हमें आज्ञा नहीं देता । दुसरे राज्य(ग्रुप) में प्रचार करने जाते हैं तो वहां की एडमिन सरकार हमें लताड़ के भगा देती हैं। अब आप ही बताये हम क्या करे? ऐसे में आप, हमारी देश की भोली भाली जनता ही हमारी आखिरी उम्मीद हैं। आप हमारी पार्टी का यत्र-तत्र-सर्वत्र इत्ता प्रचार करे की हर व्यक्ति हमें वोट देने(लाइक करने) पर विवश हो जाए। हम आपको विकास, विलास और विनाश की गारंटी देते हैं।
आपका कुंडलीमार चौकीदार,
नकारा मोटा उर्फ़ नमो
बेबीडोल
कुछ समय पहले एक मित्री से मिलने गया था, वो एक गाना गुनगुना रही थी माय नेम इज़ शिला, शिला की जवानी.... मुझे आश्चर्य हुआ मैंने पूछा तुम्हारा नाम शिला कबसे हुआ? और ये जवानी का क्या टोटका हैं? उसने हंसकर कहा, बुद्धू ये तो गाना है... अच्छा!! गाना हैं...
वह मित्री आगे जाकर मुन्नी, बबली, पिंकी और न जाने क्या क्या हुई... पर हर बार उसने यही जवाब दिया कि बस गाना हैं!
कल आप किसी बारात या महिला संगीत में इन्ही गानो पर टाइट जींस में ठुमके लगाती नज़र आएगी। तो क्या हुआ बस गाना हैं...और उस गाने पर एक शालीन नृत्य भी...
और आपका क्या दोष हैं? यह तो एक पुरुष जनित समाज की घटिया सोच हैं, भ्रष्ट मानसिकता हैं और उस मानसिकता से उपजा एक गीत मात्र हैं। आप तो मासूम हैं, आपका गुनगुनाना मासूम हैं, उस गीत को स्वीकारना मासूम हैं उस पर नाचना मासूमियत हैं। आपका कोई दोष नहीं हैं।
तो क्या आप नाचना छोड़ दे या संगीत का चयन फेसबुक पर पोस्ट पढ़ कर करे?
नहीं! आप नाचिये, गाईये, झूमिये... किसी की औकात नहीं की आपको रोक सके...कम से सवा तीन सौ लाइक वाले पेज के किसी संकीर्ण सोच वाले एडमिन की तो बिलकुल नहीं।
लेकिन सोचिये, कि क्या आप यही सब हैं?
एक सोने की बेबी डोल, एक कम अक्ल वाली औरत, जो किसी घटिया perfum लगाने वाले आदमी पर मरी जाती है, जिसका मन किसी 45000 वाली बाइक की बेकसिट पर लगा हुआ हैं, जो मर्दों के शेविंग क्रीम से लेकर कंडोम के पैकेट तक पर बिछी मिलती है, जिसे हीरो 'बडे आराम से से' विलेन से बचाता हैं और वो लिपटी जाती हैं।
लेकिन क्या करे? आपका दोष नहीं है आप तो मासूम हैं, नादान हैं। पुरुष शासित समाज से दबी हुई हैं, डरी हुई हैं।
नहीं! माफ़ कीजियेगा आप(और शायद मैं भी) गलत हैं। आप ऐसी नहीं हैं। आप शक्ति हैं वह 'ई' जिसके बिना 'शिव' भी मात्र 'शव' हैं। आपको किसी की बहन, माँ, बेटी, या पत्नी होने की आवश्यकता नहीं हैं, किसी पुरुषवादी संबोधन की आवश्यकता नहीं हैं। आप 49% हैं, जो केवल वोट डालने मात्र नहीं हैं। बाकी 51% आप पर आश्रित हैं।
सम्भलिये और अपना वजूद पहचानिए...और यह मात्र आप कर सकती हैं आपका पति, बेटा, पिता या प्रेमी नहीं। आप कोई कोई बेबी डोल नहीं हैं...क्योंकि भले ही यह सोने की हो....खेलने के ही काम आती हैं।
एडमिन
वे उल्लू होते हैं…शक्ल से, अक्ल से और नक़ल से, तन से , मन से और धन से. उन्हें कोई काम नहीं होता वे एकदम निठल्ले होते हैं. ज्ञान कूट कूट कर भरा होता हैं इतना ज्यादा कि संभाले नहीं संभलता, छलकता हैं. उन्हें शौक नहीं होता, आदत होती हैं या यूँ कहे कि लत होती हैं इस ज्ञान को प्रकट करने की, अपनी उँगलियाँ गिसवाने की, रात को बारह बजे तक आँखे फुड़वाने, और इतनी मेहनत के बाद भी तरसने की, लोगो की गालियाँ खाने कि और उन्हें मनाने की…सूरत से फक्कड़ मगर सोच से जिंदादिल होते हैं ये पेज के एडमिन होते हैं.
ये रात को तारे नहीं गिनते, पेज पर लाइक गिनते हैं, ये प्रेमगीत नहीं लिखते हैं पेज पर मोदीराग की पोस्ट्स लिखते हैं, प्रेमपत्र से ज्यादा महत्वपूर्ण इनके लिए इनबॉक्स में आये mesaage होते हैं, बाजार में लडकियां देखने से ज्यादा रुचिकर इनके लिए पोस्ट की व्यूज देखना होता हैं. चैटकन्याओ की हरी बत्तियो से मुखर ये पेज में तल्लीन होते हैं ये पेज के एडमिन होते हैं.
फेसबुक, पेज मेनेजर, फोटो एडिटर, न्यूज़ फीडर, गूगल हिंदी इनपुट इनके फ़ोन के मुख्य सॉफ्टवेयर होते हैं. गेलेरी में फोटो से ज्यादा इनके नोटपैड में नोट्स होते हैं. नोटिफिकेशन में पेज के फीड्स होते हैं. विभिन्न सामाजिक पेज इनके बुकमार्क्स होते हैं. हिंदी टाइपिंग में सिद्धहस्त होते हैं ये पेज के एडमिन होते है.
मोदी-रागा-केजरी के ज्ञाता, भाग्य विधाता होते हैं. समस्त कर्रेंट अफेयर्स के व्याख्याता होते हैं मगर दोस्तो के बीच खामोश रहते हैं. अंधभक्ति, अन्धविश्वास से चिढ़ते हैं, देश के हालत से कुढ़ते हैं, पर सच समझते हैं. खुद को ना हो पसंद पर आपकी पसंद परोसते हैं. हंसते हसाते सेंटीमेंटल गमगीन होते हैं ये पेज के एडमिन होते है.
#आईला_ये_तो_poem_बन_गई
ps.- ये पोस्ट पढने के बाद अगर आपके सामने सफ़ेद कपडे पहने किसी शांत से व्यक्ति का मुस्कुराता सा चहरा आया हो तो यकिन मानिए आप गलत हैं क्योंकि एडमिन ऐसे नहीं होते हैं…. :-) :-)
टेडीबियर
बिटिया सुबह से जिद पकड़ कर बैठी हैं. नया टेडीबियर लाकर दो. सुबह से घर में धमाल मचाय रखा हैं.
"का करेगी नए टेडीबियर का इत्ते सारे खिलौने धरे तो हैं?" हम गिरियाये.
"नहीं हमें नया टेडीबियर चाहिए" बिटिया आंसुओ की गंगा जमुना एक करते सबुडाते हुए बोली.
"अभी दुई महीने पहले वो गाने वाला गुड्डा लाये थे का हुआ उसका अब घर के कोनो में रवड़ता फिरता हैं."
"वो तो खुद ही अलमारी से गिर के टूट गया" बिटिया ने आशाभरी नज़रो से सफाई पेश की.
"खुद ही टूट गया! तो फिर वो ही काठ का गुड्डा ले लो, 5-10 साल उसका कुछ नहीं बिगड़ता हैं."
"नही उसकी तो आवाज ही नहीं निकलती हैं." बिटिया ठुनकते हुए बोली.
"नहीं बोलता तभी तो इत्ता लम्बा चलता हैं तुम्हारा बोलने वाला तो खुद ही अलमारी से गिर गया." हम कटाक्ष किये.
"नहीं हमें टेडीबियर चाहिए" बिटिया आडवानी सुर में आ गयी.
"अजी दिला भी दो, बच्ची हैं खेल लेगी" मेहरारू थर्ड फ्रंट बनते हुए बोली.
"का दिला दो, इसे कुछ पता भी पड़ता हैं और ये टेडीबियर कब से बोलने लग गए?"
"नहीं ये बोलता हैं पड़ोस वाले गुड्डू के पास हैं बहुत बोलता हैं" बिटिया ने जिद पकड़ ली.
अब का करे बिटिया हैं, जिद हैं, टेडीबियर तो दिलाना ही पड़ेगा, वरना एक टेडीबियर चलता ही कित्ता हैं ज्यादा से ज्यादा पांच साल…
बुधवार, 2 अप्रैल 2014
राजनीती में जलती धार्मिक रोटियां!
रोटियाँ एक जैसी होती हैं, सब उसी आटे से बनी हुई सब एक हाथ से बनी हुई. उनमे कभी फर्क नहीं होता हैं. सब चपटी, सब गोल सब का एक जैसा स्वाद.
हम सब एक साथ उठते हैं, बैठते हैं, हँसते हैं रोते हैं. हम ऑफिस में एक साथ लंच खाते हैं, एक ही कूलर से पानी पीते हैं, ट्रेफिक सिग्नल पर सब एक साथ खड़े रहते हैं. हम उनकी शादियों में जाते हैं और वो हमारी, हम उनके त्यौहार मनाते हैं और वो हमारे. तब हम नहीं पूछते की तुम्हारी जात कौनसी हैं, तुम्हारा धर्म कौनसा हैं, ST हो, SC हो, OBC हो, हिन्दु हो मुस्लिम हो, हम नहीं पूछते.
लेकिन ऐसे तो काम नही चलने वाला था. आखिर उन्हें भी तो अपना ढाबा चलाना था. तो उन्होंने अंतर किया, कुछ रोटियां जलाई गई, कुछ को कच्चा रखा गया, कुछ पर ज्यादा घी डाला गया, कुछ पर कम सब को अलग अलग किया गया. नेताओ ने पहले धर्म मे बाटा, फिर जात मे बाटा, फिर अमीर गरीब को अलग किया, फिर सर्वण को दलित से अलग किया. हिन्दु को मुसलमान से, जैन को हिन्दु से अलग किया. दलितो मे जहर भरा , यह कहकर कि ब्राह्मणो ने उनका शोषण किया हैं. मजदुरो को कहा कि पूँजीपतियो ने उनका शोषण किया हैं मुसलमानो को कहा कि हिन्दु तुम्हे खत्म कर डालेगे, अल्पसंख्यक रोटियाँ हो. हिन्दुओं को कहा कि तुम्हारा हिंदुत्व खतरे में हैं रक्षा करो. फिर आये ब्राह्मणो के पास कहा कि दलितो को तो आरक्षण मिला है तुम्हे क्या मिला ? (प्रश्न यह हैं की दिया किसने?) और इसका असर क्या हुआ? हम अपने देश को भूलकर अपने कर्तव्यो को भूलकर बस लडते जा रहै है बिना यह सोचे समझे कि क्या लडकर जो हासिल होगा वो तो हमारे तब भी काम नही आने वाला क्योकि यह राजनीति करने वाले अच्छी तरह जानते है कि उनकी जरुरत जनता को जिस दिन से खत्म हुई वो बेरोजगार हो जायेगे फिर तो उनके पास ना तो कोई वजह होगी आपसे वोट मांगने कि ना झगडा करवाने का कोई तरिका होगा. तो वो इसे खत्म करना ही नही चाहते बस जब तक चक्की मे से आटा पीस कर आ रहा है वो खा रहै है जिस दिन चक्की के दोनो पाटो मे से एक ने चलने से मना किया भूखे मर जायेगे. आप खुद सोचिये कि आजादी के 60 से 70 साल बाद तक जो विकास नही हुआ उसका क्या कारण है? क्यू हम आज भी पिछडे देशो मे गिने जाते है? क्या हमारे पास योग्यता नही है? अगर हम भारतीय योग्य ना होते तो क्यू पूरी दुनिया मे सबसे ज्यादा डाक्टर इँजीनियर वैज्ञानिक शिक्षक बिजनस मैन हम भारतीय है? क्यू वो भारत मे रहना नही चाहते? कारण है कि अगर यहा रहना है तो लडना पडता है अपनो से, अपने सिस्टम से, भ्रष्टाचार से, धर्म से, आरक्षण से….
समय ने सब कुछ तो दिखाया है हमको फिर भी हम अपनी नींद से जागने को तैयार नही हैं, जानते तो हैं मगर मानने को तैयार नहीं हैं किरोटियाँ जलाई जा रही हैं आग लगाई जा रही हैं और कहीं न कहीं हम खुद घी डाल रहे हैं.
धर्म रक्षक
आज वह बार-बार अपने इश्वर को याद कर रही थी. उसका लड़का जो बाहर दूध लेने गया था अभी तक वापस नहीं आया था और शहर में दंगे शुरू हो गए थे. अपने इश्वर को महान बताने की खातिर दो प्रजातियाँ आपस में भीड़ चुकी थी.
लेकिन वह तो एक माँ थी, काफी देर तक करने के बाद भी उसे कोई रास्ता नहीं दिखा तो खुद अपने बेटे को ढूंढने के लिए बाहर निकल पड़ी.
रास्ते में धर्म युद्ध के विप्रुद्ध दृश्य थे. मकान जल रहे थे, लाशें बिखरी पड़ी थी, मौत का सन्नाटा छाया हुआ था. वह आँखों से आंसू बहाती, अँधेरे में छाया कि भांति आगे बढ़ रही थी. तभी पीछे से एक आवाज आयी
'रुको!' वह ठिठक कर वही खड़ी हो गयी.
दो योद्धा हाथ में तलवारे लिये खड़े थे.
"कौन हो तुम हिन्दू या मुस्लिम?" एक ने गरजते हुए पूछा.
''मेरा बे…." उसकी आँखों से आंसुओ की धारा बहती रही. वह आगे न बोल पायी.
"राम को मानती हो या अल्लाह को, जल्दी बताओ?" दुसरे ने तलवार लहराते हुए पूछा.
आंसुओ की धारा रुक चुकी थी. भय अब ख़त्म हो चूका था.
"नास्तिक हूँ." उसने धीरे से कहा और पीछे मुड़ कर आगे बड़ गयी.
वे धर्मरक्षक एक परछाई को छोटा होते हुए देख रहे थे.
धर्म विरुद्ध
मैं बस में चढ़ा और खाली सीट पाकर बैठ गया। फेसबुक ऑन किया तो किसी क्रन्तिकारी मित्र ने डेढ़ गज़ लम्बी पोस्ट डाल रखी थी कि किस तरह दंगो में मुसलमानों ने हिंदुओ का कत्लेआम किया था? पूरी पोस्ट पढ़ते पढ़ते खून गरम हो गया और माथे पर पसीना छलक गया। आखिर हम हिन्दू कर क्या रहे हैं?
मोबाइल से नज़रे हटाई तो देखा की पास में एक छोटी बच्ची अपने छोटे भाई के साथ बैठी हैं। दोनों हँसते खेलते हुए बहुत प्यारे लग रहे थे । मैंने प्यार से लड़की के सर पर हाथ फिराया और उसका नाम पूछा। 'आतिफा' उसने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा। 'मुस्लिम' मैं स्तब्ध सा बैठ गया। शायद मैंने ध्यान नहीं दिया उनकी अम्मा पीछे की सिट पर जा बैठी थी। मैं कुछ देर तक उन मासूमो की अठखेलियो को निहारता रहा। फिर मेरे अन्दर के बालप्रेम को रहा नहीं गया तो मैंने धीरे से बच्चे के माथे पर एक चुम्बन दे दिया।
खिड़की से बाहर देखा की दूर क्षितिज पर आसमान धरती से मिल रहा था और मैं जानता हूँ आसमान का कोई अस्तित्व नहीं हैं।
"सच्ची घटना"
यार की शादी
प्रथम दृश्य
अंतरे को याद करने में असमर्थ गवैया बार-बार मुखड़े
को दोहराया जा रहा हैं। ढोलवाला ऐसे
ढोल को पीट रहा हैं जैसे पड़ोस के गाँव को हमले
की सुचना देनी हो। कीबोर्ड
वाला जानता हैं उसको कोई नहीं सुनने वाला हैं
वो अपनी ही धुन बजाये जा रहा हैं।
घोड़ी वाला पिछली चार रातो से
नहीं सोयी घोड़ी को हंटर मार मार कर नचा रहा हैं। इन
सब
से बेखबर बाराती मिट्टी उड़ाते हुए नाचते जा रहैं हैं।
दिल्ली वाले चाचाजी पर्याप्त
खातिरदारी नहीं होने की शिकायत करते शादी छोड़कर
चले गए। दूल्हा जो माँ के दबाव में
घोड़ी चढ़ने को तैयार हुआ था मुंह लटकाए बैठा हैं।
....और दुल्हन का बाप सोच रहा हैं
कि क्या इसी बकवास के लिए मैंने
लाखो का खर्चा किया था?
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द्वितीय दृश्य
दुल्हे की बारात द्वार पर आ चुकी हैं, दुल्हे के गले में
दो मालाएं X बना रही हैं, हाथ में
तलवार ऐसी लग रही हैं मानो दुल्हन को जंग में जीत
कर लाना हो। दुल्हे के मोबाइल पर
जो की बहना के हाथ में हैं Mamiji Indore के
"Jaan plz ek baar baat karlo...."
वाले मेसेज आ रहे हैं।(भला हो Pattern Lock का)
वैसे भी बहना Hike का प्रशिक्षण लेने
में व्यस्त हैं।
घोड़ी को भड़काते हुए धमाके करते हुए पटाखे छोड़े
जा रहे हैं। उन पटाखो के बचे हुए
कागजो पर बाराती "ये देश है वीर जवानों का" की धुन
पर
अवसरवादी देशभक्ति का प्रदर्शन कर रहे हैं। दुल्हे
का भाई सोच रहा हैं कि काश
वो भी 15 दिन की छुट्टी लेकर डांस क्लास अटेंड कर
लेता तो आज इस मुए राज
को दिखा देता, बड़ा माइकल जैक्सन बन रहा हैं। दुल्हे
का बाप सोच में हैं कि फ्रीज़
तो पहले से ही था 32" वाली LED ही मांगनी चाहिए
थी। दुल्हे की माँ सोच रही हैं
कि 20000 और जोड़ कर वो लखनवी हार ले
लेती तो बात ही अलग होती।
अन्दर दुल्हन परेशान हो रही हैं लेकिन पसीना तक
नहीं आ सकता क्योंकि मेकअप ख़राब
होता हैं। उसका Whats App status तो वैसे
भी Last Seen 05/02/2014 हो रखा हैं।
दुल्हन कि माँ फ़िक्र में हैं लड़की कभी आठ बजे से
पहले ही नहीं उठी पता नहीं ससुराल में
क्या करेगी? दुल्हन का बाप कोने में कुर्सी पर
बैठा जल्दी जल्दी से खाना ठूस रहा हैं
पता नहीं बाद में मिले कि नही?
...और मैं जो की दोस्त के साथ Unofficialy इस
शादी में आया हूँ extra काउंटर पर इन
सबसे दूर पानीपूरी गटकते हुए सोच रहा हूँ कि हो न
हो यह नीली ड्रेस वाली 11th क्लास
की रीमा ही हैं।
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तृतीय दृश्य
दुल्हन विवाह के लिए मंडप में बैठ चुकी है.
साड़ी पहनने की आदि न होने के कारण घूँघट के
अन्दर पसीने में तरबतर है. दूल्हा चाचाजी के लाख
मना किये जाने के बावजूद भी पटियाला सूट पहनकर
आ गया है. दुल्हन का प्रेमी जो बात बात पर नस काट
लेने की धमकी देता रहता हैं जेब में ब्लेड लिए दुल्हन
को घूरते हुए मंडप के आस पास घूम रहा है. उसे
गुस्सा इस बात का था कि उसने जिस लड़की के लिए
उसने अपनी सगाई तोड़ी थी वो किसी और की होने
जा रही है. उसने कई बार दुल्हन
को डराया भी था कि देख लेना गुंडे ' 'टाइप'
लड़का का हैं. लड़की की जिसके साथ दस साल तक
सगाई रही थी वो बेचारा घर पर बैठा बैठा ''मुबारक
हो तुमको ये शादी तुम्हारी'' वाले गाने सुन रहा हैं. उसे
माँ ने जैसे तैसे समझाया हैं "तु काहे फिकर करता हैं
तुझे तो उस जैसी हजारों मिलेगी."
दुल्हन का बाप इस चिंता में आधा हुआ जा रहा हैं
कि बात तो 5,00,000 की हुई थी, ये अचानक
नैनो कहाँ से आ गयी?
दुल्हे के उस टाइप के दोस्त शादी में बिरयानी और
पिने की व्यवस्था न होने के चलते शादी छोड़ के
जा चुके है. बचे हुए मित्र ताड़कासुर बने
अपनी नेत्रज्योति ठीक कर रहे हैं. बारातियों में से
आधे "बेबी डोल मैं सोणे की…" पर अपना पुरुषत्व
खतरे में डाल रहे हैं और आधे पेट फाडू खाने के बाद
कुर्सियां तोड़ रहे है.
और हम नीली ड्रेस वाले से बतियाते बतियाते ''…तो तू
व्हाट्सएप्प यूज़ नहीं करती हैं क्या?" वाले डायलोग के
सहारे नंबर लेने का जुगाड़ बिठा रहे हैं.
ps- कृपया लेख को किसी भी राजनितिक परिपेक्ष में
न देखे दिक्कत हो सकती हैं।
प्यार का इज़हार एक जुर्म हैं???
पिछले महीने मैं कुछ फोटो देख रहा था जिसमे बजरंग दल के कार्यकर्ता वैलेंटाइन डे पर प्रेमी युगल के चेहरे पर काला रंग लगा रहे थे. वे बहुत व्यथित दिख रहे थे और कानून के रक्षक इस मुद्रा में खड़े थे जैसे उन्होंने देश पर कोई परमाणु हमला होने से रोक दिया हो. उज्जवल भविष्य की अपेक्षा करने वाले भारत की ऎसी तस्वीर वास्तव में दुखदायी है . मैं नहीं जानता कि क्यों हमारा प्रशासन हमारे नागरिकों की स्वतंत्रता के बुनियादी मानव अधिकार को बचाने में हरबार नाकाम रहता है? इसका विरोध इस आधार पर किया जाता हैं की वैलेंटाइन डे एक विदेशी संस्कृति हैं जो भारतीय संस्कृति के लिए घातक है. मेरा प्रश्न हैं की क्या हजारो वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति इतनी कमजोर हैं जो मात्र प्रेम के इज़हार (या जो कुछ भी आप समझे) से ढह जाएगी.
अगर हम इतिहास पर नज़र डाले तो पायेंगे की भारतीय संस्कृति एक ऐसी संस्कृति हैं जो हमेशा व्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करती है . हमारा इतिहास हमें बताता हैं की मात्र कुछ हज़ार साल पहले हम एक खुली सोच वाले समाज थे. सेक्स हमारे लिए इन दिनों की तरह एक वर्जित विषय नहीं था और हम एक बहुत खुश और समृद्ध समाज थे. इतिहासकारों के अनुसार, मुगल और ब्रिटिश आक्रमण से सेक्स के प्रति हमारे विचार पूरी तरह से बदल गए और हम एक सबसे पाखंडी समाज में बदल गये. ध्यान दे पर्दा पृथा, बाल विवाह आदि इसी काल की देन है. ये कभी भी हमारी संकृति के हिस्सा नहीं थे.
मेरा दूसरा प्रश्न यह हैं की अगर हम भारतीय संस्कृति को समझे तो क्या वाकई मैं यह हमें उदार(या उन्मुक्त ) होने से रोकती हैं? वेद के अनुसार पुरुषार्थ (एक व्यक्ति के आध्यात्मिक कर्त्तव्य) में काम (sex) क्रम में केवल धर्म (religion) के बाद आता है.
हमें स्वीकार करना होगा की हम खुद के प्रति ईमानदार नहीं हैं. जब हम वैलेंटाइन डे, विदेशी संस्कृति इत्यादि पर उल्टियां करते हैं तो यह भूल जाते हैं की हमारा पहनावा, तकनीक, कंप्यूटर, मोबाइल्स, फेसबुक इत्यादि सब इसी विदेशी संस्कृति की देन है और हम चाहे या न चाहे हमें इस विदेशी संस्कृति एवं इसके इन उपहारों के साथ ही जीना पड़ रहा है . चलिए मुझे बताइए हम क्यों भारतीय होने पर गर्व करे? अब कृपया मुझे वैदिक काल एवं हमारे पूर्वजो के बारे में बताना शुरू न कर दे. वे वास्तव में महान थे, उस वक्त महिलाओ को कपडे पहनने पूरी छुट थी क्योकि वे आज की तरह हवस के भूखे नहीं थे और उन्हें न ही उन्हें इस तरह के राजनितिक ढकोसले करने का वक्त था. दिनों दिन बढ़ते बलात्कार, छेड़ - छाड़ हमारी दोहरी मानसिकता के ही तो प्रतिक है .
वास्तव में कुछ देशो में तो लोग उन नियमो का पालन कर रहे हैं जो की हमने वैदिक काल में खोजे थे और आप देख सकते हैं वे हमसे ज्यादा खुश और समृद्ध हैं.
क्या हम अपने लोगो को साफ़ पानी, सही शिक्षा, नवीन तकनीक दे रहे हैं? शायद नहीं. तो क्या हमें नहीं सीखना चाहिए की कैसे विदेशी हमसे यह बेहतर कर रहे है ?
क्या हम अपने यहाँ महिलाओ को पूरा सम्मान दे पाते है? शायद नहीं. तो क्या हमें पाश्चात्य संस्कृति से यह नहीं सीखना चाहिए की कैसे हम स्त्रियों का सम्मान कर सकते हैं.
नहीं हम नहीं सीख सकते हैं. क्योंकि हमें शर्म आती हैं वह सब सिखने में जो हमने खुद उन्हें कभी सिखाया था.
ps- उम्मीद हैं इस पोस्ट के पश्चात कोई हमें पाश्चात्य संस्कृति का एजेंट घोषित नहीं करेगा. :-)
धर्म!!!
वह बचपन में बहुत ही चंचल और नटखट थी. सबकी दुलारी सबकी आँखों का तारा… लेकिन एक दिन खेलते खेलते अपने घर की तीसरी मंजिल से गिर गयी. 12 हड्डियां और 23 पसलियाँ टूटी थी. 2 साल तक ICU में एडमिट रही थी. आज हालत यह हैं की सांस लेती तो भी तकलीफ होती है. पास से हवा गुजरे तो भी दर्द से कराह उठती हैं. किसी के छूने भर से तड़प उठती हैं और दौबारा हॉस्पिटल में एडमिट करवाना पड़ता हैं .
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धर्म एक चड्डी के समान होता हैं. नहीं… नहीं… वो वाली नहीं जो घुटनों तक आती हैं बल्कि वो वाली जो उसके भी अन्दर होती हैं जो उन चीजो को छिपाने के काम आती हैं जो अगर पब्लिक में दिख जाए तो आपकी फजीहत हो सकती है. वैसे पुराने जमाने में इसका उतना महत्त्व नहीं था बल्कि इसकी जगह घुटनों तक आने वाला जाति वाचक चड्डा पहना जाता था और उसके ऊपर धोती या लंगोट(वर्ण) लपेटा जाता था, बकायदा उसे पूरा छुपा दिया जाता था. लेकिन आज के कुल ड्यूड कालीन युग में पेंट को एक हाथ नीचे बाँध कर चड्डी को दिखाना एक फैशन बन गया हैं. इसको permanentaly हटाना केवल कुछ सिध्हस्त साधुओ के बस का हैं जबकि temprarily कब हटाया जाता हैं इसके बारे में बात करना मर्यादाओ के विरुद्ध समझा जाता हैं.
वैसे आम जनता के लिए इसका प्रयोग सामान्य रूप में होता हैं और जब हम घर से बाहर निकलते हैं तो ऊपर पेंट(प्रोफेशन) वगेरह पहन लेते हैं. हम कभी भी बाहर दुसरे को नहीं पूछते हैं कि तुम्हारी चड्डी कौनसे कलर की हैं? क्योंकि हमें कभी इसकी जरुरत ही नहीं पड़ती हैं. लेकिन हमारे सुपरमैन नेताओ के लिया इसका प्रयोग अति विशिष्ट होता हैं वे इसे पेंट के ऊपर पहनते हैं. वे चड्डियो के डीलर होते हैं जो हर पांच साल में एक बार ( जब नगर निगम उनकी दूकान हटाने वाला होता हैं) आपको याद दिलाते हैं कि देखो तुम्हारी चड्डी हरे कलर की हैं, तुम्हारी वाली केसरिये कलर की है. वे उकसाते हैं की आप अपनी चड्डी खोल कर हवा में लहराते हुए सबको दिखाए कि देखो मैंने भी पहन रखी हैं . वैसे सबने पहन ही रखी होती हैं कलर कोई भी हो.
आजकल यही सीजन चल रहा हैं दुकाने हटाई जा रही हैं, नयी दुकानों के लिए टेंडर आ चुके हैं, दूकान मालिक सुपरमैन बने पेंट के ऊपर चड्डी पहने घूम रहे हैं, और आपको उकसा रहे हैं कि आप अपनी वाली हवा में लहराए….
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ps.- इस पोस्ट को पढने के बाद अगर आपकी भावना आहत हुई हो तो उसे दौबारा हॉस्पिटल में एडमिट करवा आये.
शीर्षक कविता (title song)
अन्तस में प्रेत मन्त्र हैं,
ओठों पर गीता है;
जी रहे मुखौटे हैं,
आदमी न जीता है।
दर्द में इजाफ़ा तो,
कर दिया हकीमों ने;
वैसे तो चोट बहुत;
हल्की थी मोच में।
बँटे खेत, दालान, वरोठे,
टुकड़े-टुकड़े आँगन;
किंतु अभी भी गड़े आँख में,
बूढ़ें बापू की पेंशन।
साँपों के आगे पड़कर,
अब नेउला पूँछ हिलाए;
शेर देखते ही सियार को;
फौरन हाथ मिलाए।
जिसकी बाँहों में पलते हैं
उसे बखूबी डसते हैं,
बहुत बार आजमा लिया
अब न भरोसे करते है।
टका सेर में बिकती भाजी
टका सेर में खाजा,
यदि अँधेर बचाना है तो
बदलो चौपट राजा।
आँखे भले हम मीच ले,
पर दिन तो न ढलता हैं।
सुबह-अख़बार-चाय और कहना,
सब ऐसे ही चलता हैं।
यह चक्र हैं दुनिया गोल हैं
सब वही पर आता हैं।
जो करता वो भी भरता हैं,
जो देखे वो भी चुकाता हैं।
सूरज को दीपक दिखाते,
और अंधियारी रात करते हैं।
हम कद में छोटे सही,
बड़े ख़यालात करते हैं।
कोई हो शहंशाह घर का,
हम डट कर मुलाकात करते हैं।
खामोश हूँ तो लाजवाब न समझ,
समन्दर कहाँ प्रपात करते हैं?
अगर मगर अब बहुत हुआ,
चल अब सीधी बात करते हैं।
तू चल अपनी औकात दिखा,
हम भी बराबर जात करते हैं।
आज जो आमने सामने हैं,
मिलकर कर एक एक हाथ करते हैं।
छोटा मुंह हैं,
मगर बड़ी बात करते हैं।
-विनय भदौरिया एवं पेज प्रबंधक
{छोटा मुंह और बड़ी बात}














