शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

पगडंडियो का जमाना

एक स्त्री नौकरी के सिलसिले में एक बड़े
आदमी के पास सच्चरित्रता का प्रमाणपत्र
लेने गयी थी। बड़े आदमी ने पहले उसे अपने
शयनकक्ष ले जाना चाहा और बाद में
सच्चरित्रता का प्रमाणपत्र देना चाहा।
पहले देवता आदमी बनकर ठगते थे, अब
आदमी देवता बनकर ठगते हैं।

# पगडंडियों_का_ज़माना <>
# हरीशंकर_परसाई

स्विस बैंक की हकीकत

स्विट्जरलैण्ड के ऊपर से गुजरते वक़्त
हेलीकॉप्टर से नीचे झांक रहे रजनीकांत
का पर्स जिस बिल्डिंग पर गिरा, वह आज
स्विस बैंक के नाम से पहचानी जाती है।
वहां रखे पैसे को काला धन कहा जाता है।
वैसे, जितना काला बताया जा रहा है,
रजनीकांत उतने भी काले नहीं। फिर इस धन
के काले होने क़ी इतनी हवा काहे उडी है।
बाबाजी का ठल्लू

शिव शिव शिव शिव शिव

शिव के राज में, शिव के माह में, शिव के
लिए जल
ला रहे शिव भक्त कावड़ियों पर, शिव के
नाम
पर, शिव क़ी पुलिस क़ी लाठियां .. समझ
नहीं आता, येन त्योहारों पर भीड़भाड़ भरे
धार्मिक स्थलों पर यह वीआईपी मूवमेंट
होता ही क्यों है ??
सन्दर्भ >> सावन के पहले सोमवार
को तो उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर में
सपरिवार दर्शन को पहुंचे
मुख्यमंत्री क़ी सहूलियत के लिए
कावड़ियों पर
पुलिस ने खूब लाठियां भांजी। सात साल
के एक
बच्चे तक को नहीं छोड़ा गया। कोई
देखना चाहें, तो सहारा मध्यप्रदेश/
छत्तीसगढ़
के पास, अभी भी टेप सुरक्षित होगा ।।

शिवसेना की गुस्ताखी

एक पुरानी कहावत हैं कौए का बैठना और
डाल का टूटना। महाराष्ट्र सदन में
शिवसेना सांसदों ने ख़राब खाने के चलते एक
कैंटीन वाले को जबरदस्ती रोटी खिलाई।
लेकिन कैंटीन वाला एक रोजेदार मुस्लिम
निकला। यह मात्र एक संयोग
था या धर्मभ्रष्ट करने
की सोची समझी साजिश
वो तो पता नहीं लेकिन धर्म की आड़ में
बवाल करने शिवसेना मुश्किल में दिखती हैं।

#हरि_अनंत_हरि_कथा_अनन्ता

स्वार्थी सेनाएं

अभी हाल ही में फेसबुक पर एक पोस्ट
प्राप्त हुई. समाज से जुडी एक नयी ' सेना'
बनी थी जो भर्ती निकाल रही थी. उस
सेना में शामिल होने के लिए नंबर मांगे गए
थे और अनेक नवयुवक अपने नंबर कमेंट कर रहे
थे. मैंने नादानी से पुछ लिया कि "भैया ये
सेना आखिर करेगी क्या?" तो सारे
नवचयनित सैनिक टूट पड़े और अपने शब्द
भेदी बाण चलाने लगे.
जहाँ तक मेरा ज्ञान हैं भगवान राम
की वानर सेना थी जिन्होंने दुष्ट
राक्षसों का संहार किया था. भगवान
शिव के गण थे जो जी-जान से शिव
जी की रक्षा करते थे. महाराणा प्रताप
की सेना थी जिन्होंने मुगलों की ईट से ईट
बजा दी थी और वर्तमान में देश की सेना हैं
जो देश की रक्षा में जुटी हुई है. आखिर
आपकी सेना क्या करती हैं?
आप कहते हैं धर्म की रक्षा! लेकिन सबसे
ज्यादा धर्म की बारह तो आपने खुद
बजा रखी है. और आप अपने धर्म
की रक्षा करते कैसे हैं? दुसरे धर्म
को हानि पहुंचा कर ! जब अखबार में
आता हैं कि फला सेना के युवको ने
फला धर्म के युवक
को पिटा तो क्या इससे हमारे धर्म
का सम्मान बढ़ता होगा? नहीं इससे
तो केवल आपका अहम् तुष्ट होता है.
आपकी सेना का अन्य प्रयोग होता हैं
राजनितिक पार्टियों की महत्वकांशाओ
की खातिर रखे जाने वाले बंद के दौरान
दुकानों के शटर बंद करवाने और
लोगो को धमकाने के लिये. तब ये सेनिक
लट्ठ लेकर निकल जाते हैं और आमजनों के
सामने दादागिरी दिखाते है.
इसके आलावा आपकी सेना के ब्रांड नेम
का प्रयोग ट्राफिक सिग्नल और
पार्किंग लोंज में होता हैं जब इन
सैनिको से पार्किंग फीस या चालान
माँगा जाता हैं, तब ये बड़े गर्व से कहते हैं
'अबे तू जानता नहीं हैं मैं फला सेना से हूँ'.
अगर सामने वाला समझदार हो तो इन्हें
ससम्मान जाने देता हैं वरना फिर ये अपने
सेनापति को फोन लगाते हैं
जो किसी पुलिस अधिकारी को और
अंततः उस हवलदार को एक फोन आता हैं
और वो बेचारा हाथ जोड़कर इन्हें जाने
देता है.
इसके अलावा भी इस सेना का उपयोग
इसके चयनित सैनिको को कालेज में
एडमिशन, पास करवाने,
सरकारी नौकरी दिलाने इत्यादि हेतु
सेटिंग बिठाने हेतु किया जाता है.
मेरा प्रश्न ये हैं कि अगर इनके 'सैनिको'
को समाज या देश की सेवा ही करनी हैं
तो ये आर्मी क्यों नहीं ज्वाइन करते? जब
इन तथाकथित सेनाओ का समाज, देश और
धर्म के लिए कोई उपयोग हैं
ही नहीं तो क्यों ये हमारे धर्म और इश्वर
की आड़ लेते हैं?

कुटनीतिक समझ

कूटनीति समझ पाना हम आम आदमीयो के
बस का नही पर कुछ एक को लगता है
की यूएन मे वोट करने के पहले इंडिया के
राजदूतो ने कूटनीतिक सलाहकारो ने
नौकरशाहो ने और प्रधानमंत्री के विदेश
नीति सलाहकारो ने रक्षा सचिव, विदेश
मंत्री ने बातचीत नही की और वहा यूएन मे
जाकर बिना पूछे वोट कर दिया अरे कौन
समझाये की भैया वो वार्ड के चुनाव मे
वोट डालने नही गये थे यूएन मे गये थे
जहा हर काम सोच समझ कर
किया जाता है तो आपकी सोच जहा तक
पहुच ना पाये तो क्यू अपनी दिमाग फ्यूज
पडे 0 वाल्ट के बल्ब को जलाने का प्रयास
करते हो
p.s-नीजि रूप मे ना ले अपने अपने विचार
है

शनिवार, 5 जुलाई 2014

ईश्वर तक कैसे पहुंचे?

"धर्म ईश्वर तक पहुँचने का एक रास्ता हैं या यूँ
कहे ईश्वर के बहाने खुद को पहचानने
का ही रास्ता हैं । क्योंकि कहा गया हैं
कि आत्मा ही परमात्मा हैं। जब हम
परमात्मा तक पहुँचने के लिए धर्म के अनुसार
किसी विशेष विधि का प्रयोग करते हैं तो हम
आत्मा के ऊपर पड़े आवरणों को हटाते हैं।
लेकिन आजकल धर्म एक आडम्बर और पाखण्ड
मात्र रह गया हैं। धर्म का मूल उद्देश्य ख़त्म
हो चूका हैं, भगवान एक भय और धर्म एक चाबुक
बन के रह गया। यहाँ इस कड़ी में धर्म के
उसी रास्ते को बताने का प्रयास कर रहा हूँ।
अपेक्षा हैं पसंद आएगा।"
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योग पद्धति योग के उस क्रम का वर्णन
है जिस क्रम पर चल कर कोई भी साधक
परमात्माबोध या ईश्वर के साक्षात्कार के
लक्ष्य तक पहुँचता है. संस्कृत भाषा का शब्द
योग संस्कृत धातु " युज " से उत्पन्न हुआ है,
जिसका अर्थ है " निरोध ", " जुड़ना " , "
रोकना " , " एकत्व ". संस्कृत
भाषा की व्याकरण के अनुसार योग शब्द
का अर्थ दो सन्दर्भों में (दो प्रकार से )
लिया जाता है. जब इसका अर्थ करण के
अनुसार लिया जाता है तो इसका अर्थ
साधन, मार्ग, विधि निकलता है ; और
अधिकरण में अर्थ लेने पर इसका अर्थ लक्ष्य,
एकत्व, अंत, परिणाम, बोध निकलता है.
इसलिए योग को कुछ लोग साधन या मार्ग
कहते हैं और कुछ लोग लक्ष्य, एकत्व या बोध
कहते हैं. जब हम योग शब्द का अर्थ लक्ष्य
या बोध लेते हैं तो हम परमात्मा के बोध
(भगवन के साक्षात्कार) के अनुभव की बात
कर रहे होते हैं जिसका शब्दों में वर्णन
नहीं किया जा सकता. परन्तु जब हम योग
शब्द का अर्थ साधन, विधि, लेते हैं
तो इसका क्रमानुसार वर्णन
किया जा सकता है.
भारत के महान् ऋषि पतंजलि ने अपने
योगसूत्रों में योग
की परिभाषा "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"
बताई है, जिसका अर्थ है चित्त (मन)
की समस्त वृत्तियों का पूरी तरह रुक
जाना ही योग है. यह योग या चित्त
की वृत्तियों का सर्वथा रुक जाना एक क्रम
विशेष के अनुसार चलने पर शीघ्र ही सिद्ध
होता है, और वह क्रम है :- दीक्षा, श्रवण,
मनन, ध्यान और समाधि.
भारतीय ग्रंथों में अनेक प्रकार के
भक्तों,साधकों के लिए अनेक प्रकार के
मार्गों जैसे भक्तियोग, कर्मयोग,
ज्ञानयोग, राजयोग, हठयोग,
आदि का वर्णन किया गया है, परन्तु साधक
चाहे किसी भी मार्ग से चले उसे दीक्षा,
श्रवण, मनन, ध्यान एवं समाधि, इस क्रम पर
चलना ही पड़ता है.
इस कड़ी के भाग-
१. योग पद्धति : योग दीक्षा
१.१ योग पद्धति : समय संस्कार दीक्षा
१.२ योग पद्धति : भूत शुद्धि ( षडध्वशोधन )
२. योग पद्धति : श्रवण
३. योग पद्धति : मनन
४. योग पद्धति : ध्यान
४.१ योग पद्धति : ध्यान की विधियाँ
४.२ योग पद्धति : ध्यान में होने वाले अनुभव
भाग १ , भाग २ , भाग ३ , भाग ४
४.३ योग पद्धति : साधना के विघ्न और
उनके उपाय
५. योग पद्धति : समाधि
६.१ सपनों के अर्थ
६.२ साधना में विघ्नसूचक स्वप्न/दु:स्वप्न
(बुरे सपने)
६.३ साधना में विघ्नसूचक स्वप्न/
दु:स्वप्नों (बुरे सपनों) के उपाय
६.४ शुभ स्वप