आँखे भले हम मीच ले, पर दिन तो न ढलता हैं। सुबह-अख़बार-चाय और कहना, सब ऐसे ही चलता हैं। यह चक्र हैं दुनिया गोल हैं सब वही पर आता हैं। जो करता वो भी भरता हैं, जो देखे वो भी चुकाता हैं। सूरज को दीपक दिखाते, और अंधियारी रात करते हैं। हम कद में छोटे सही, बड़े ख़यालात करते हैं। कोई हो शहंशाह घर का, हम डट कर मुलाकात करते हैं। छोटा मुंह हैं, मगर बड़ी बात करते हैं।
शनिवार, 26 जुलाई 2014
राजा का नाम
चयन
प्रेम सीमाएं नहीं जानता, जब भी होता हैं बे-हद होता हैं।सही और गलत के तथाकथित दायरों से परे होता हैं। जब तक रहता हैं इन कसौटियो पर नही समाता। यह सामाजिक रुढियो, कूटनीतियों से दूर बहता हैं। जब हमने भी किया तो बेइंतेहा किया। लेकिन हर पतंग की डोर धरती पर ही होती हैं। हम माने या न माने हमें रहना तो यही हैं। तुमने ही अपने घरवालो के खिलाफ न जाकर उनकी पसंद से शादी कर ली। मैंने भी चाहते न चाहते वही किया। क्या करता चारा भी नहीं था। आज इतने वक़्त बाद जाकर सबकुछ सही हुआ हैं। एक हद तक तुम्हे भुला पाया हूँ, पत्नी को अपना पाया हूँ, एक साल का बच्चा भी हैं, जो अभी सामने खेल रहा हैं। प्यार आज भी तुमसे उतना ही करता हूँ।
फ़ोन बज रहा हैं। Unknown no. हैं लेकिन जानता हूँ तुम ही हो। Answer/Reject बता रहा हैं। तुम ही बताओ किसे चुनु?
शुक्रवार, 25 जुलाई 2014
उत्तरप्रदेश राजनीती
गृहमंत्री चाहें तो उत्तर प्रदेश सरकार
की बखिया यह कह कर उघाड़ सकते हैं
क़ि चूँकि उप्र में सत्तारूढ़ दल
की लोकसभा चुनाव में बुरी तरह से हार हुई
है तो उसको विधानसभा में मिला जनादेश
भी बेमतलब है। राज्य सरकार को बर्खास्त
करने की नई मुहीम के लिए संविधान
खंगालने की जरुरत भी नहीं होगी, पूर्व में
१९७७ में जनता पार्टी की जीत के बाद
कई राज्यों की कांग्रेस सरकारें
तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह ने
यही कह कर बर्खास्त करने की नीति चल
दी थी।
# छोटा_मुंह_और_बड़ी_बात
भगवान की माया
अभी सावन चल रहा है !
बचपन से मतलब की जब से समझदार हुऐ
पिताजी की नकल करके सावन के उपवास
रखते थे. उस समय हम भक्ति नही सिर्फ
साबुदाना की खिचडी की खातिर ये सब
करते थे.समय के साथ साथ जब बडे तो शायद
भक्ति का मतलब भी जान गये पर सिर्फ
टीवी पर आने वाले धारावाहिक देखकर
जैसे, जय बजरंगबली,श्री गणेश,रामायण,श्र
ी कृष्णा,हर हर महादेव.
हम अपने फेवरेट भगवान महादेव को चुने
क्यूकी विश्वास था की वो बडे अच्छे है
पर गुस्साये गये तो भैया आप राख.फिर कुछ
दिन कुछ साल गुजरे समाझदार और
सयानेपन की घुट्टि पीकर शायद भूल गये
अपने फेवरेट भगवान को और सवाल उठे मन
की भगवान अगर सबका है तो क्यू
वो सिर्फ उनकी मदद करता है जो उन्हे
ढाई करोड का सोने का हाथ 50 लाख
का सिँहासन 100 करोड का मंदिर दान दे
सकता है फिर जब उस भगवान यह
दुनिया बनाई जिसने आपको और मुझे
बनाया जिसने मौसम धरती आकाश
बनाया भला वो क्यू इन सोने की धातुओ
और कागज के टुकडो मे बिक गया क्या उसे
नजर नहीँ आता की शायद
वो आदमी जो 2 दिन से दर्शन की लाईन
मे एक नारियल लेकर खडा है इस इंतजार मे
की कब अपनी छोटि सी मन्नत पूरी कर
पाये और एक आदमी हैलिकाप्टर से आता है
मर्सिडीज मे बैठता है वीआईपी गेट से अंदर
जाकर भगवान को एक करोड रूपये का चैक
चढाता है
इन दोनो मे भगवान भला क्यू अंतर
करता है. आप कहेगे भगवान नहीँ इंसान
करता है अंतर फिर भगवान क्यू
तमाशा देखता है । क्या उस आदमी के पास
एक करोड का चैक नही इसलिये ना ?
और यही बात हमको खटकी. बस यही बात
पर हम चल पडे नास्तिकता की राह पर
कहने लगे कहा का भगवान कौनसा भगवान
अबे कोई भगवान नही होता यहा
पर शायद जीवन को खुद से मतभेद रखने
का बडा चाव है ! अचानक एक के बाद एक
कुछ ऐसी घटनाये घटी की उस उम्र मे जब
बाकी सब लौँडे लडकिया ताडने बाईक
दौडाने मे रूची लेते हम फिर विश्वास
पैदा किये उस ईश्वर के प्रति माने उसे और
स्विकारे उसकी सत्ता और
प्रभुता को क्यूकी तब अपनी औकात
पता चली के आप इतने लायक या समझदार
नही के इंसान से भगवान बन जाये आप
इंसान है और आपकी जात इंसानियत है
जिसके गुण आप छोड नही सकते अब रात
को आपको प्रवचन दे दिये चलो आगे
अगली बार लिख कर बता देगेँ
आपको अभी आप जाकर इनबाक्स मे
जाकर ऐँजल प्रिया को रिप्लाई कर
दिजिये बेचारा उप्स बेचारी बैठी है
इंतजार मे
बलात्कार के मुद्दे पर सोते प्रतिनिधि
एक साहब विधानसभा मे रेप जैसे
संवेदनशील मुद्दे पर बहस के दौरान
अपनी वीआईपी कार मे किये गये सफर से
चढी भारी थकान उतारने के लिये अगर 10
मिनिट सो गये तो आप
सभी स्यापा मचाये हो अरे
वो भी आपकी तरह हि इंसान है जब आप
अपने 4 दोस्तो के बीच यह मुद्दा आने पर
बात पलट देते हो तब आपको याद
नही आता खैर कहे भी किसे जब कोई सूने
तब ना अब भला कौन चाहेगा अपने आप से
सवाल पूछना जब जवाब आप पहले से जानते
है जब प्रजा हि अंधी हो तो काहे काने
राजा मे कमीया खोजते हो
(बहस का मुद्दा न बनाये समझने वालि बात
है )
सोच बयां करते लाइक्स/कमेंट्स
1-2 दिन से इस पेज पर विभिन्न प्रकार
की पोस्ट्स की जा रही हैं। लाइक्स और
कमेंट्स भी हो रहे हैं। लेकिन इनमें एक ट्रेंड
देखने को मिला हैं। जब भी कोई
सामाजिक सरोकार वाली पोस्ट
होती हैं, जिसमें किसी सामाजिक बुराई
पर वार किया जाता हैं लोग ऐसे दूर भागते
हैं जैसे किसी को नंगा देख लिए हो।
लाइक कमेंट तो छोडिये व्यूज तक के लाले
पड़ जाते हैं। जैसे continue reading का बटन
दबाना भारी हो गया हो। इसी जगह जब
आपकी तारीफ़ में कोई पोस्ट
डाली जाती हैं लाइक्स और शेयर्स आने शुरू
हो जाते हैं।
बात लाइक्स की नहीं हैं, इस पेज
की भी नहीं हैं। हमारी हैं, हमारी सोच
की हैं। क्या हम केवल वही सुनना चाहते हैं
जो हमें अच्छा लगता हैं,
जो हमारी तारीफ़ में हो। फिर चाहे सच
हो या झूठ हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम
बस आत्ममुग्ध हो जाते हैं। वही सच से हम दूर
भागते हैं। जब हमें
आइना दिखाया जाता हैं हम
चेहरा छुपा लेते हैं। हम बदलाव तो चाहते हैं
लेकिन बदलना नहीं चाहते। सच
बोलना तो चाहते हैं लेकिन सच
सुनना नहीं चाहते हैं। क्या वास्तविक
जीवन में भी हम यही तो नहीं करते हैं?
भद्रजनो का खेल
पान गटकने के बाद इहाँ- उँहा पीक कर
सड़कों से छेड़छाड़ करते देसी भद्रजन
या भद्रजनों के खेल के मक्का कहे जाने वाले
लॉर्ड्स में पिच से छेड़छाड़ करते
फिरंगी भद्रजन .. दोनों में भले ही कुछ फर्क न
हो, लेकिन भारत लॉर्ड्स में खम्ब ठोंकने के पूरे
मूड में है !! #Cricket